पेट्रोल-डीजल के दाम इस महीने चौथी बार बढ़े:दिल्ली में पेट्रोल ₹2.61 और डीजल ₹2.71 प्रति लीटर महंगा हुआ

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटने के बावजूद भारत में दो हफ्तों में चौथी बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए गए हैं। इस बढ़ोतरी के पीछे तेल कंपनियों के पुराने घाटे की भरपाई, भारी-भरकम टैक्स ढांचा और डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया मुख्य कारण हैं।

पेट्रोल-डीजल के दाम इस महीने चौथी बार बढ़े:दिल्ली में पेट्रोल ₹2.61 और डीजल ₹2.71 प्रति लीटर महंगा हुआ

देश की आम जनता पर महंगाई की एक और बड़ी मार पड़ी है। सोमवार, 25 मई से देश भर में पेट्रोल और डीजल के दाम एक बार फिर बढ़ा दिए गए हैं। पिछले महज दो हफ्तों के भीतर यह चौथी बार है जब ईंधन की कीमतों में यह इजाफा हुआ है। इस ताजा बढ़ोतरी के बाद देश की राजधानी दिल्ली समेत तमाम बड़े शहरों में ईंधन के दाम नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं।

ताजा फैसले के तहत पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत में 2.71 रुपये प्रति लीटर की भारी बढ़ोतरी की गई है। यह नई दरें सोमवार सुबह छह बजे से पूरे देश में प्रभावी हो चुकी हैं। इस बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल की नई कीमत 102.12 रुपये प्रति लीटर हो गई है, जबकि डीजल का भाव बढ़कर 95.20 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गया है।

वैश्विक बाजार में मंदी, भारत में तेजी क्यों?

भारत में तेल की कीमतें ऐसे समय पर लगातार चढ़ रही हैं, जब ग्लोबल मार्केट (अंतरराष्ट्रीय बाजार) में कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) लगातार सस्ता हो रहा है। ऐसे में आम उपभोक्ताओं के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब दुनिया भर में तेल के दाम गिर रहे हैं, तो भारत में यह महंगा क्यों होता जा रहा है? इसके पीछे कुछ प्रमुख आर्थिक और नीतिगत कारण काम कर रहे हैं।

तेल कंपनियों के पुराने घाटे की भरपाई

जब पिछले महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बेहद ऊंचे स्तर पर थीं, तब भारत की सरकारी तेल कंपनियों (जैसे IOCL, BPCL, HPCL) ने देश में घरेलू कीमतों को स्थिर रखा था। उस दौरान कंपनियों को प्रति लीटर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। अब जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल कुछ नरम हुआ है, तो तेल कंपनियां सबसे पहले अपने उस पुराने घाटे (Under-recoveries) की भरपाई करने में जुटी हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दाम घटने के बावजूद भारत में कीमतें बढ़ाई जा रही हैं।

टैक्स का भारी-भरकम ढांचा

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार के उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और राज्य सरकारों के वैट (VAT) के रूप में जाता है। तेल की मूल कीमत काफी कम होती है, लेकिन इन टैक्सों के जुड़ने के बाद यह दोगुनी से भी ज्यादा हो जाती है। वैश्विक मंदी के दौर में भी सरकारें आमतौर पर अपने टैक्स ढांचे में कटौती नहीं करतीं, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार की गिरावट का सीधा फायदा आम जनता की जेब तक नहीं पहुंच पाता।

डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया

भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटती भी है, लेकिन उसी अनुपात में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर हो जाता है, तो भारत के लिए आयात की लागत कम नहीं होती। डॉलर की मजबूती के चलते भी तेल आयात करना महंगा बना रहता है।

लगातार दो हफ्तों में चौथी बार हुई इस बढ़ोतरी ने आम आदमी के बजट को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है। जानकारों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का फायदा घरेलू उपभोक्ताओं को देना है, तो केंद्र और राज्य सरकारों को टैक्स के मोर्चे पर राहत देने के बारे में सोचना होगा, अन्यथा आने वाले दिनों में माल ढुलाई महंगी होने से रोजमर्रा की अन्य चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं।