एक अनोखी परंपरा: आखिर कौन हैं रंगाधारी ?
'रंगाधारी' को कई क्षेत्रों में कुल देवता माना जाता है, जिनके प्रसाद को कुल की शक्ति मानकर घर की चहारदीवारी के भीतर ही रखने की परंपरा है।
कौन हैं 'रंगाधारी'? जिनका प्रसाद घर की शादीशुदा बेटियों को भी नहीं दिया जाता! जानिए इसके पीछे का सच
भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं में कई ऐसे रहस्य और मान्यताएं छिपी हैं, जो सुनने में भले ही अजीब लगें, लेकिन उनके पीछे सदियों पुरानी आस्था और कुछ ठोस तर्क होते हैं। इन्ही में से एक है 'रंगाधारी' (जिन्हें कुछ क्षेत्रों में लोक देवता या पितृ देव के रूप में पूजा जाता है) के प्रसाद से जुड़ी परंपरा।
कहा जाता है कि रंगाधारी का प्रसाद घर की शादीशुदा बेटियों को नहीं दिया जाता। आइए जानते हैं इसके पीछे की कहानी और इस रहस्यमयी परंपरा का सच।
कौन हैं रंगाधारी?
रंगाधारी मुख्य रूप से उत्तर भारत के कुछ विशेष क्षेत्रों और समुदायों (विशेषकर बुंदेलखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों) में पूजे जाने वाले लोक देवता या कुल देवता माने जाते हैं। इन्हें अक्सर 'खेतपाल' या 'कुल पुरुष' के रूप में भी देखा जाता है जो परिवार और संपत्ति की रक्षा करते हैं। इनकी पूजा सादगी के साथ की जाती है, लेकिन इनके नियम बहुत कड़े होते हैं।
शादीशुदा बेटियों को प्रसाद क्यों नहीं दिया जाता?
इस परंपरा के पीछे कोई भेदभाव नहीं, बल्कि प्राचीन 'कुल और गोत्र' की मान्यताएं जुड़ी हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
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कुल की मर्यादा और सुरक्षा: मान्यता है कि रंगाधारी 'कुल देवता' हैं। जब बेटी की शादी हो जाती है, तो धार्मिक रूप से उसका गोत्र और कुल बदल जाता है (वह दूसरे कुल की सदस्य बन जाती है)। परंपरा के अनुसार, रंगाधारी का प्रसाद केवल उसी कुल के सदस्यों तक सीमित रखा जाता है।
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नकारात्मक प्रभाव का डर: लोक मान्यताओं के अनुसार, यदि इस प्रसाद को दूसरे कुल (बेटी के ससुराल) में ले जाया जाता है, तो देवता रुष्ट हो सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह प्रसाद घर की चहारदीवारी के भीतर ही रहना चाहिए ताकि कुल की 'बरकत' और 'शक्ति' बाहर न जाए।
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बेटियों की सुरक्षा: एक अन्य प्राचीन तर्क यह भी दिया जाता है कि इस प्रसाद के नियम बहुत कठिन होते हैं। बेटी अपने ससुराल में इन नियमों का पालन कर पाएगी या नहीं, इस संशय के कारण उसे इस जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाता है ताकि उस पर या उसके ससुराल पर कोई दोष न आए।

क्या है इसके पीछे का सच?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इसका कोई भौतिक आधार नहीं है, लेकिन समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह परंपरा कुल की पहचान और गोपनीयता को बनाए रखने के लिए बनाई गई थी। पुराने समय में लोग अपनी विशिष्ट पूजा पद्धतियों को अपने ही वंश तक सीमित रखना चाहते थे।
आज के आधुनिक युग में कई परिवार इन परंपराओं को 'अंधविश्वास' मानकर त्याग चुके हैं और बेटियों को भी सम्मानपूर्वक प्रसाद देते हैं। हालांकि, ग्रामीण अंचलों में आज भी श्रद्धावश इन नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है।
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