बिना धुएं, बिना तार... जानिए कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन ?
प्रदूषण के नाम पर सिर्फ पानी और भाप! धुएं की जगह पानी छोड़ने वाली 'हाइड्रोजन ट्रेन' का साइंस बेहद दिलचस्प है।
ट्रेन में रखा है 'बिजलीघर', बिना धुएं और बगैर तार के कैसे दौड़ेगी हाइड्रोजन ट्रेन?
भारतीय रेलवे तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। बुलेट ट्रेन और वंदे भारत के बाद अब देश में हाइड्रोजन ट्रेन (Hydrogen Train) को लेकर चर्चाएं तेज हैं। बिना डीजल के काला धुआं उड़ाए और बिना सिर के ऊपर फैले बिजली के तारों (OHE Lines) के, यह ट्रेन पटरियों पर रफ्तार भरने के लिए तैयार है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिना किसी बाहरी पावर सोर्स के यह ट्रेन चलती कैसे है? दरअसल, इस ट्रेन की छत पर ही एक पूरा 'बिजलीघर' यानी पावर प्लांट रखा होता है। आइए समझते हैं इसके पीछे का दिलचस्प विज्ञान।
छत पर रखा 'बिजलीघर': क्या है इसका साइंस?
पारंपरिक इलेक्ट्रिक ट्रेनें पटरी के ऊपर बिछे तारों से बिजली लेती हैं, जबकि डीजल इंजन ईंधन को जलाकर ऊर्जा बनाते हैं। हाइड्रोजन ट्रेन इन दोनों से बिल्कुल अलग है। यह अपने साथ अपना ईंधन और अपना बिजलीघर दोनों लेकर चलती है।
इस तकनीक को नीचे दिए गए डायग्राम से आसानी से समझा जा सकता है:
इस सिस्टम के मुख्य रूप से तीन बड़े हिस्से होते हैं जो ट्रेन की छत और निचले हिस्से में फिट होते हैं:
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हाइड्रोजन टैंक (Hydrogen Tank): इसमें अत्यधिक दबाव (High Pressure) में लिक्विड या कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस को सुरक्षित रखा जाता है।
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फ्यूल सेल (Fuel Cell): यही वह 'बिजलीघर' है जहां असली जादू होता है। यह ट्रेन की छत पर लगा होता है।
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लिथियम-आयन बैटरी (Battery): यह पैदा हुई एक्स्ट्रा बिजली को स्टोर करती है और ट्रेन को अचानक मिलने वाले एक्सीलरेशन (रफ्तार) के समय अतिरिक्त पावर देती है।
बिना धुएं के कैसे बनती है बिजली? (The Chemical Process)
हाइड्रोजन ट्रेन में किसी भी तरह का दहन (Combustion या आग लगना) नहीं होता। इसमें बिजली बनाने के लिए एक केमिकल रिएक्शन (रासायनिक प्रक्रिया) का इस्तेमाल किया जाता है जिसे 'फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी' (Fuel Cell Technology) कहते हैं।
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हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का मिलन: टैंक से हाइड्रोजन गैस को फ्यूल सेल में भेजा जाता है। वहीं दूसरी तरफ से हवा में मौजूद ऑक्सीजन को भी इस सेल के अंदर लिया जाता है।
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रिवर्स इलेक्ट्रोलेसिस (Reverse Electrolysis): जब हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के परमाणु फ्यूल सेल के भीतर आपस में मिलते हैं, तो एक रासायनिक प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया से सीधे बिजली (Electricity) पैदा होती है।
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इंजन को मिलती है पावर: इस बिजली से ट्रेन के नीचे लगे पावरफुल इलेक्ट्रिक मोटर्स (Engine) घूमते हैं और ट्रेन बिना किसी शोर के दौड़ने लगती है।
सबसे हैरान करने वाली बात (साइलेंस और विदाउट पॉल्यूशन):
इस पूरी प्रक्रिया में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली एक भी गैस नहीं निकलती। इस केमिकल रिएक्शन का एकमात्र बाय-प्रोडक्ट (By-product) पानी (H₂O) और भाप होता है। यानी साइलेंसर से धुएं की जगह शुद्ध पानी की बूंदें टपकती हैं!
भारत में कब चलेगी?
भारतीय रेलवे 'इको-फ्रेंडली' सफर की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल हरियाणा के जींद-सोनीपत रूट पर करने की तैयारी है। इसके अलावा देश के ऐतिहासिक और पहाड़ी हेरिटेज रूट्स (जैसे कालका-शिमला) पर भी इसे चलाने की योजना है, ताकि वहां के संवेदनशील पर्यावरण को प्रदूषण से बचाया जा सके।
बेशक, हाइड्रोजन को बनाना और उसे स्टोर करना अभी थोड़ा खर्चीला है, लेकिन भविष्य की ग्रीन एनर्जी के लिहाज से यह तकनीक आने वाले समय में दुनिया भर के ट्रांसपोर्ट की तस्वीर बदलने वाली है।
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