भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' ने 450 किमी ऊपर अंतरिक्ष में तिरंगा लहराया !
आसमान छोटा पड़ गया! भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' सफलतापूर्वक लॉन्च। अंतरिक्ष की रेस में भारत की एक और ऊंची छलांग।
भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कामयाब: 450 किमी ऊपर कक्षा में पहुंचा; पीएम मोदी ने फोन पर बधाई दी
भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है।
इस ऐतिहासिक मिशन को 'मिशन आगमन' (Mission Aagaman) नाम दिया गया था।
काउंटडाउन के दौरान बढ़ी धड़कनें
शनिवार सुबह इस लॉन्चिंग को लेकर भारी उत्साह था। पहले यह लॉन्च सुबह 11:30 बजे निर्धारित था।
विक्रम-1 रॉकेट की 5 बड़ी खूबियां
रॉकेट विक्रम-1 को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में नाम दिया गया है।
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कार्बन-फाइबर बॉडी:
यह रॉकेट पूरी तरह से कार्बन-कंपोजिट (Carbon-Fibre based) ढांचे पर बनाया गया है, जो इसे बेहद हल्का और अविश्वसनीय रूप से मजबूत बनाता है। -
3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन:
इस रॉकेट में आधुनिक सॉलिड फ्यूल बूस्टर्स के साथ-साथ अत्याधुनिक 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। -
पेलोड क्षमता:
विक्रम-1 पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में करीब 350 किलोग्राम तक के पेलोड/सैटेलाइट ले जाने में सक्षम है। -
मल्टी-सैटेलाइट इंसर्शन:
यह रॉकेट एक साथ कई छोटे उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने की क्षमता रखता है। -
त्वरित असेंबली:
स्काईरूट के मुताबिक, इस रॉकेट को मात्र 24 घंटे के भीतर किसी भी लॉन्च साइट से असेंबल और लॉन्च के लिए तैयार किया जा सकता है।
सब-ऑर्बिटल और ऑर्बिटल रॉकेट में क्या अंतर है?
स्काईरूट एयरोस्पेस ने इससे पहले नवंबर 2022 में 'विक्रम-एस' (Vikram-S) रॉकेट लॉन्च किया था।
इसके विपरीत, 'विक्रम-1' एक ऑर्बिटल (Orbital) क्लास रॉकेट है।
भारतीय स्पेस सेक्टर के लिए क्यों है यह ऐतिहासिक दिन?
साल 2020 में केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़े सुधारों को मंजूरी दी थी, जिसके तहत निजी कंपनियों के लिए भारतीय अंतरिक्ष के दरवाजे खोले गए।
भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के लिए गेम चेंजर:
"विक्रम-1 का यह सफल प्रक्षेपण तीन विकासात्मक (Developmental) उड़ानों में से पहला है। इसके बाद कंपनी नियमित रूप से कमर्शियल लॉन्च सेवाएं शुरू करेगी। इससे भारत वैश्विक स्तर पर छोटे उपग्रहों (Small Satellites) के लॉन्चिंग बाजार का एक बड़ा हब बनकर उभरेगा, जिससे इसरो पर से छोटे कमर्शियल प्रोजेक्ट्स का बोझ कम होगा और वह गहरे अंतरिक्ष मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा।"
पूर्व इसरो वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका द्वारा स्थापित 'स्काईरूट एयरोस्पेस' ने इस कामयाबी के साथ भारत के निजी स्पेस इकोसिस्टम को एक नई बुलंदी पर पहुंचा दिया है।
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