कांग्रेस वंदे मातरम के दो ही छंद क्यों गाएगी ? जानें 1937 का सच और इतिहास !
क्या आप जानते हैं कि कांग्रेस कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के पहले दो छंद ही क्यों गाए जाते हैं? जानिए 1937 के कोलकाता CWC प्रस्ताव, रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह और सरदार पटेल की भूमिका का पूरा इतिहास।
कांग्रेस और 'वंदे मातरम्': 1937 का ऐतिहासिक फैसला और आज का संदर्भ
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यसमिति (CWC) ने यह स्पष्ट किया है कि पार्टी के सार्वजनिक व आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के पहले दो छंद (Stanzas) ही गाए जाएंगे।
1. 1937 का विवाद और पृष्ठभूमि
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1870 के दशक में रचित और बाद में उनके उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में शामिल 'वंदे मातरम्' भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य प्रेरणा-स्रोत और नारा बन गया था। 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे गाकर राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया।
1930 के दशक के मध्य में जब प्रांतीय चुनाव हुए और कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकारें बनाईं, तब 'वंदे मातरम्' के गायन को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
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पहले दो छंदों की प्रकृति:
शुरुआती दो पद विशुद्ध रूप से मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली, जल और उर्वरता की स्तुति करते हैं ("सुजलाम्, सुफलाम्, मलयजशीतलाम्...")। -
बाद के छंदों पर आपत्ति: इसके बाद के छंदों में मां दुर्गा, लक्ष्मी और वाणी जैसी हिंदू देवियों और पौराणिक प्रतीकों का उल्लेख आता है। मुस्लिम लीग और कुछ अन्य गैर-हिंदू वर्गों ने यह तर्क देते हुए आपत्ति जताई कि एकेश्वरवादी मान्यताओं के कारण वे मूर्तिपूजा या देवी-स्तुति वाले अंशों का गायन नहीं कर सकते।
2. 28 अक्टूबर 1937 का CWC प्रस्ताव और रवींद्रनाथ टैगोर की भूमिका
स्वतंत्रता संग्राम में सभी समुदायों की साझी भागीदारी बनाए रखने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने इस मुद्दे के समाधान के लिए एक समिति बनाई। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और पंडित नेहरू ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से विचार-विमर्श किया।
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टैगोर का परामर्श:
टैगोर ने स्पष्ट किया कि गीत के पहले दो पद मातृभूमि की कोमलता, सुंदरता और ममता को दर्शाते हैं, जिससे किसी भी वर्ग या धर्म की आस्था को ठेस नहीं पहुँचती। परंतु बाद के छंदों का संदर्भ धार्मिक है, जिसे पूरे बहुधर्मी देश के साझा मंच पर अनिवार्य बनाना उचित नहीं होगा। -
CWC का निर्णय (1937):
टैगोर की सलाह पर कांग्रेस कार्यसमिति ने 28 अक्टूबर 1937 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में औपचारिक प्रस्ताव पारित किया। इसमें तय हुआ कि: -
राष्ट्रीय सम्मेलनों और सार्वजनिक मंचों पर 'वंदे मातरम्' के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे।
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इसके साथ ही आयोजकों को अन्य सर्वसमावेशी देशभक्ति गीत गाने की भी छूट रहेगी।
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3. सरदार पटेल और संविधान सभा तक का सफर
1937 के इस प्रस्ताव को सरदार वल्लभभाई पटेल समेत कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं की सर्वसम्मत सहमति प्राप्त थी।
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संविधान सभा का फैसला (24 जनवरी 1950):
आजादी के बाद जब राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के चयन का विषय आया, तब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ऐतिहासिक बयान दिया।
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'जन गण मन' को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान (National Anthem) घोषित किया गया।
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'वंदे मातरम्' के पहले दो छंदों को स्वतंत्रता संग्राम में उसके ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए राष्ट्रगीत (National Song) का दर्जा और राष्ट्रगान के समान सम्मान दिया गया।
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कांग्रेस का तर्क है कि दो छंदों को गाना किसी भी तरह से राष्ट्रगीत का अपमान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में सरदार पटेल, महात्मा गांधी, नेहरू और टैगोर द्वारा तय की गई सर्वसमावेशी परंपरा का पालन है।
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