अंबाजी मंदिर विवाद में ऐतिहासिक फैसला !

अदालत ने अंबाजी मंदिर के मालिकाना हक और आय पर दांता महाराजा के दावों को खारिज करते हुए उन पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया है।

अंबाजी मंदिर विवाद में ऐतिहासिक फैसला !

अंबाजी मंदिर पूजा विवाद: कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला !

प्रसिद्ध शक्तिपीठ अंबाजी मंदिर के प्रशासन और स्वामित्व को लेकर लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद में अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। इस फैसले से अंबाजी मंदिर ट्रस्ट को बड़ी राहत मिली है, वहीं दांता राजपरिवार को कानूनी मोर्चे पर झटका लगा है।

क्या था पूरा मामला ?

दांता के पूर्व महाराजा द्वारा अंबाजी मंदिर के प्रशासन, मालिकाना हक और मंदिर की आय के हिसाब-किताब को लेकर अदालत में एक याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गई थीं:

  • आय का विवरण: मंदिर ट्रस्ट द्वारा मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों से होने वाली कुल आय, लाभ और चढ़ावे का पूरा हिसाब दिया जाए।

  • बकाया राशि का भुगतान: यदि गणना के बाद कोई राशि शेष निकलती है, तो वह याचिकाकर्ता (दांता महाराजा) को भुगतान की जाए।

  • संपत्ति पर रोक: जब तक मामले का अंतिम फैसला न आ जाए, तब तक ट्रस्ट या उसके कर्मचारी किसी भी संपत्ति की बिक्री या हस्तांतरण (Transfer) न कर सकें।

  • कोर्ट रिसीवर की नियुक्ति: मंदिर और उसकी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए अदालत द्वारा किसी योग्य व्यक्ति या 'कोर्ट रिसीवर' को नियुक्त किया जाए।

अदालत का फैसला और जुर्माना

माननीय अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और सबूतों को ध्यान में रखते हुए दांता महाराजा की इस याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मंदिर ट्रस्ट का प्रशासन और स्वामित्व कानूनन मान्य है। याचिका को निराधार मानते हुए कोर्ट ने दांता महाराजा पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और इस राशि को कोर्ट में जमा करने का आदेश दिया।

ऊपरी अदालत से भी नहीं मिली राहत

इस फैसले से असंतुष्ट होकर दांता महाराजा ने पालनपुर की 'प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज कोर्ट' में सिविल एप्लीकेशन दायर कर न्याय की गुहार लगाई थी। हालांकि, वहां भी उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया गया और अदालत ने उनके दावे को पुनः खारिज कर दिया।

इस ऐतिहासिक फैसले ने अंबाजी मंदिर के प्रशासनिक ढांचे को मजबूती दी है। पिछले कई दशकों से चल रहे इस विवाद के समाप्त होने से मंदिर ट्रस्ट अब बिना किसी कानूनी अड़चन के मंदिर का प्रबंधन और विकास कार्य जारी रख सकेगा।