Cockroach Janta Party: क्यों नहीं मिलेगा CJP को 'कॉकरोच' चुनाव चिन्ह?

यूट्यूब और गूगल सर्च के लिए: इंस्टाग्राम पर धूम मचाने वाली 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) को क्या सचमुच 'कॉकरोच' या 'मोबाइल फोन' का चुनाव चिह्न मिल सकता है? जानिए भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के वो कड़े नियम और पंजीकरण की कानूनी प्रक्रिया जो इस इंटरनेट पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। पूरी ख़बर के लिए देखें BRG News!

Cockroach Janta Party: क्यों नहीं मिलेगा CJP को 'कॉकरोच' चुनाव चिन्ह?

डिजिटल दौर की एक ऐसी सनसनीखेज ख़बर, जिसने सोशल मीडिया से लेकर देश के सियासी गलियारों तक में हलचल मचा दी है! ज़रा सोचिए, क्या कोई पार्टी सिर्फ 5 दिनों के भीतर इंस्टाग्राम पर दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल को पछाड़ सकती है? आप सोच रहे होंगे कि यह नामुमकिन है, लेकिन इंटरनेट की दुनिया में यह मुमकिन कर दिखाया है एक नई नवेली वर्चुअल पार्टी ने, जिसका नाम है—'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP)!

जी हां, अमेरिका के बोस्टन शहर में बैठे अभिजीत दिपके नाम के एक शख्स ने मज़ाक-मज़ाक में इस पार्टी की शुरुआत की। अपने खास सरकार-विरोधी और तीखे व्यंग्य वाले अंदाज़ के कारण यह पार्टी इंटरनेट पर आग की तरह फैल गई। लोकप्रियता का आलम यह है कि इसने इंस्टाग्राम पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) तक को पीछे छोड़ दिया है और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो सांसदों ने भी सोशल मीडिया पर इसमें अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। हालांकि, इस भारी लोकप्रियता के बीच भारत में इसके आधिकारिक 'एक्स' (ट्विटर) अकाउंट पर रोक भी लगाई गई, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी और नया हैंडल तैयार कर लिया।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया की यह 'कॉकरोच जनता पार्टी' सचमुच चुनाव लड़ सकती है?

जानकारों की मानें तो इंटरनेट की लोकप्रियता और असल चुनाव के मैदान में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। अगर भविष्य में यह पार्टी देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहे, तो इसे चुनाव आयोग के बेहद कड़े और पेचीदा नियमों का सामना करना पड़ेगा।

  • रजिस्ट्रेशन की पहली सीढ़ी: भारत में किसी भी नए दल को चुनाव लड़ने से पहले भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के पास लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत खुद को पंजीकृत कराना अनिवार्य होता है। इसके बिना कोई भी संगठन किसी अधिकार या चुनाव चिह्न का दावा नहीं कर सकता।

  • क्यों नहीं मिलेगा 'कॉकरोच' चुनाव चिन्ह?: इस पार्टी का नाम भले ही कॉकरोच पर हो, लेकिन इन्हें चुनाव मैदान में कॉकरोच का सिंबल कभी नहीं मिल पाएगा। साल 1968 के चुनाव चिह्न आदेश के तहत यह कड़ा नियम है कि कोई भी नया सिंबल किसी पक्षी या जीव-जंतु जैसा नहीं हो सकता।

  • पशु क्रूरता पर रोक: साल 1991 में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की शिकायत के बाद चुनाव आयोग ने यह सख्त नियम बनाया था, क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान असली जानवरों को सड़कों पर घुमाकर उन पर अत्याचार किया जाता था। साल 2012 में तो प्रचार में पशुओं के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई। हाथी और शेर जैसे पुराने प्रतीक पहले से आवंटित होने के कारण चल रहे हैं, लेकिन अब किसी भी नए जीव या कीड़े-मकोड़े का सिंबल नहीं मिल सकता।

  • डिजिटल सिंबल पर भी झटका: इस इंटरनेट पार्टी ने अपने डिजिटल मिजाज को देखते हुए 'मोबाइल फोन' के चुनाव चिह्न की इच्छा जताई है। लेकिन असलियत यह है कि चुनाव आयोग की फ्री सिंबल्स वाली आधिकारिक लिस्ट में लैंडलाइन फोन और मोबाइल चार्जर तो हैं, मगर 'मोबाइल फोन' का विकल्प दूर-दूर तक मौजूद ही नहीं है!

साफ है कि सोशल मीडिया पर लाइक्स और फॉलोअर्स बटोरना जितना आसान है, देश के कड़े चुनावी नियमों के बीच अपनी पसंद का सिंबल पाना और जमीन पर चुनाव लड़ना उतना ही मुश्किल।