CJP प्रोटेस्ट के बीच जानिए क्या कहता है भारत का संविधान !
भारत में नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 से मिलता है। लेकिन याद रखें, यह अधिकार तभी तक है जब तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण हो और दूसरों के अधिकारों का हनन न हो!
भारत में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार कहां से मिलता है, संविधान क्या कहता है?
हाल ही में संसद मार्च और विरोध-प्रदर्शनों (जैसे CJP और विभिन्न संगठनों के अभियानों) के बीच यह सवाल एक बार फिर चर्चा में आ गया है कि भारत में नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार आखिर कहां से मिलता है और इस पर संविधान तथा कानून क्या रुख अपनाते हैं।
भारतीय लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराना और सरकार की नीतियों से असहमति जताना नागरिकों का एक अहम अधिकार माना जाता है। लेकिन क्या यह अधिकार असीमित है? आइए जानते हैं कि भारतीय संविधान और कानून इस संबंध में क्या कहते हैं।
संविधान में विरोध का अधिकार: क्या कहते हैं अनुच्छेद?
भारतीय संविधान में सीधे तौर पर "विरोध का अधिकार" (Right to Protest) शब्द का उल्लेख एक अलग मौलिक अधिकार के रूप में नहीं है, बल्कि यह अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली मौलिक स्वतंत्रताओं से ही निकलता है:
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अनुच्छेद 19(1)(a) - वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: यह नागरिक को अपनी राय व्यक्त करने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने और सार्वजनिक मुद्दों पर अपने विचार रखने की आजादी देता है।
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अनुच्छेद 19(1)(b) - शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार: यह नागरिकों को बिना हथियार के शांतिपूर्ण ढंग से रैलियां, सभाएं और प्रदर्शन आयोजित करने का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
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अनुच्छेद 19(1)(c) - संगठन या संघ बनाने का अधिकार: यह अधिकार नागरिकों, यूनियनों और नागरिक समाज संगठनों को एकजुट होकर मुद्दे उठाने की अनुमति देता है।
क्या विरोध का अधिकार असीमित (Absolute) है?
नहीं। संविधान निर्माताओं ने अधिकारों के साथ-साथ राज्य और लोक-व्यवस्था की सुरक्षा का भी ध्यान रखा है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत सरकार विरोध-प्रदर्शन पर 'उचित प्रतिबंध' (Reasonable Restrictions) लगा सकती है।
यह प्रतिबंध निम्नलिखित आधारों पर लगाए जा सकते हैं:
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भारत की संप्रभुता और अखंडता
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राज्य की सुरक्षा
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विदेशी राज्यों के साथ मित्रवत संबंध
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सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order)
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शिष्टाचार, नैतिकता, न्यायालय की अवमानना या अपराध के लिए उकसाना
ध्यान दें: अनुच्छेद 51A(i) के अनुसार, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना और हिंसा से दूर रहना हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।
विरोध-प्रदर्शन के लिए अनुमति क्यों आवश्यक है?
चूंकि 'कानून और व्यवस्था' (Law and Order) राज्य सूची का विषय है, इसलिए किसी भी सार्वजनिक स्थान पर विरोध-प्रदर्शन या जुलूस निकालने के लिए स्थानीय पुलिस से NOC (No Objection Certificate) लेना अनिवार्य होता है।
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निषेधाज्ञा लागू होना: पुलिस और प्रशासन लोक-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्व में CrPC की धारा 144) का उपयोग करके चार या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगा सकते हैं।
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अनुमति से इनकार: यदि प्रशासन को लगता है कि प्रदर्शन से आम जनता को भारी परेशानी, हिंसा या कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा है, तो वे अनुमति देने से इनकार भी कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर विरोध के अधिकार को लोकतंत्र का आधार स्तंभ बताया है, लेकिन इसके दायरे को भी स्पष्ट किया है:
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निर्धारित स्थान (Designated Places): सुप्रीम कोर्ट (जैसे शाहीन बाग मामले में) ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सड़कों को अनिश्चित काल के लिए अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। विरोध-प्रदर्शन केवल प्रशासन द्वारा तय किए गए स्थानों (जैसे जंतर-मंतर) पर ही होना चाहिए ताकि आम नागरिकों के आवागमन का अधिकार प्रभावित न हो।
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अधिकारों में संतुलन: अदालत का मानना है कि विरोध करने वाले के अधिकार और आम नागरिकों के जीवन व आवाजाही के अधिकार (अनुच्छेद 21) के बीच संतुलन होना अनिवार्य है।
भारत में विरोध-प्रदर्शन करना एक संवैधानिक रूप से संरक्षित मौलिक अधिकार है, लेकिन यह पूरी तरह से शांतिपूर्ण, बिना हथियारों के और तय कानूनी दायरे के भीतर ही संभव है।
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