9वीं में नो नई भाषा; सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के बढ़ते तनाव को देखते हुए केंद्र सरकार को दी बड़ी सलाह !
क्या 9वीं कक्षा में पहुंचकर एक पूरी तरह से नई भाषा सीखना छात्रों के लिए तनाव का कारण बनता है? सुप्रीम कोर्ट का तो यही मानना है!
9वीं कक्षा में तीसरी भाषा लागू करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को नसीहत !
नई दिल्ली: शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और भाषाओं के चयन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को दृढ़ता से सलाह दी है कि वह देश के स्कूलों में नौवीं कक्षा से तीसरी भाषा सीखने की अनिवार्यता को लागू न करे। अदालत का मानना है कि इतनी बड़ी कक्षा में पहुंचकर अचानक एक नई भाषा का बोझ डालने से छात्रों पर मानसिक और अकादमिक तनाव अत्यधिक बढ़ जाएगा। इसके बजाय, सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि यदि तीसरी भाषा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना ही है, तो इसकी शुरुआत प्राथमिक या उच्च प्राथमिक स्तर, जैसे कक्षा 5 या कक्षा 6 से की जानी चाहिए।
न्यायालय की यह टिप्पणी उस समय आई है जब देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) को जमीनी स्तर पर लागू करने और स्कूली पाठ्यक्रम को नया रूप देने पर गहन मंथन चल रहा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर हस्तक्षेप करते हुए अदालत ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी सीखने की स्वाभाविक क्षमता को सर्वोपरि बताया है।
देर से भाषा सीखने का मनोवैज्ञानिक दबाव
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में इस बात पर विशेष जोर दिया कि कक्षा 9 छात्रों के जीवन का एक ऐसा पड़ाव होता है जहां से उनके करियर की दिशा तय होने लगती है। इस स्तर पर छात्र पहले से ही गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों के बढ़ते पाठ्यक्रम और बोर्ड परीक्षाओं के आने वाले दबाव से जूझ रहे होते हैं। ऐसे में उनके ऊपर पूरी तरह से एक नई और अपरिचित भाषा का बोझ लाद देना व्यावहारिक नहीं है।
मनोवैज्ञानिक और शिक्षाविदों का भी यही मानना है कि बड़ी उम्र में एक नई भाषा को व्याकरण और लेखन के साथ सीखना बच्चों के लिए थकाऊ और तनावपूर्ण हो जाता है। इससे छात्र उस भाषा का आनंद लेने के बजाय उसे केवल परीक्षा पास करने का एक जरिया समझने लगते हैं, जिससे शिक्षा का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
कक्षा 5 या 6 से शुरुआत क्यों है बेहतर?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जो विकल्प सुझाया है, वह वैज्ञानिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टिकोणों से सही बैठता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों का मस्तिष्क छोटी उम्र में नई भाषाओं को बहुत तेजी से और आसानी से ग्रहण करता है। इस आयु वर्ग में बच्चों की भाषाई संवेदनशीलता उच्चतम स्तर पर होती है।
यदि कक्षा 5 या 6 से तीसरी भाषा की शुरुआत की जाती है, तो बच्चों के पास उस भाषा की बुनियादी समझ, शब्दावली और उच्चारण को विकसित करने के लिए तीन से चार साल का लंबा समय मिल जाता है। जब तक वे नौवीं कक्षा में पहुंचते हैं, तब तक वे उस भाषा में पूरी तरह से सहज हो चुके होते हैं। इस तरह, भाषा उनके लिए तनाव का कारण बनने के बजाय उनके ज्ञानवर्धन का एक माध्यम बनती है।
त्रि-भाषा सूत्र और व्यावहारिक चुनौतियाँ
भारत जैसे बहुभाषी देश में त्रि-भाषा सूत्र का उद्देश्य सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देना और छात्रों को बहुभाषी बनाना है। इसके तहत आमतौर पर मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी और एक अन्य भारतीय भाषा (अक्सर गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और हिंदी भाषी राज्यों में कोई आधुनिक दक्षिण भारतीय या अन्य क्षेत्रीय भाषा) को सिखाने का प्रावधान है।
हालांकि, इस नीति को नौवीं कक्षा से लागू करने में कई व्यावहारिक दिक्कतें हैं। पहली समस्या योग्य शिक्षकों की उपलब्धता की है। अचानक इतनी बड़ी संख्या में नौवीं के छात्रों के लिए नई भाषा के शिक्षक ढूंढना स्कूलों के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। दूसरी समस्या छात्रों की रुचि की है। देर से शुरू करने पर छात्र नई भाषा के प्रति उदासीन हो जाते हैं, जिससे इस पूरी कवायद का कोई ठोस परिणाम नहीं निकलता।
आगे की राह और अदालत का संदेश
सुप्रीम कोर्ट की इस सलाह ने केंद्र सरकार और शिक्षा नीति निर्माताओं को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने का एक स्पष्ट अवसर दिया है। शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास होना चाहिए, न कि उन्हें अंतहीन पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं के बोझ तले दबाना।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अदालत के इस रचनात्मक सुझाव को स्वीकार करते हुए शिक्षा के ढांचे में जरूरी बदलाव करने चाहिए। यदि तीसरी भाषा को कक्षा 5 या 6 से खेल-कूद, कविताओं और कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, तो वे बिना किसी अतिरिक्त तनाव के एक नई भाषा और संस्कृति से जुड़ सकेंगे। अदालत की यह टिप्पणी देश के लाखों छात्रों को राहत देने वाली और शिक्षा व्यवस्था को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
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