4 साल बाद रेपो रेट में उछाल;क्या आपका मासिक बजट बिगड़ने वाला है ?
सस्ती EMI का दौर खत्म? बढ़ती महंगाई के बीच RBI ने उठाया बड़ा कदम। जानिए आपके बजट पर इसका क्या असर होगा।
RBI ने दिया बड़ा झटका: रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद आम आदमी पर कितना पड़ेगा असर?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण पाने के लिए नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट (Repo Rate) में बढ़ोतरी का फैसला किया है। केंद्रीय बैंक के इस कदम का सीधा असर उन करोड़ों ग्राहकों पर पड़ेगा जिन्होंने होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन ले रखा है।
रेपो रेट बढ़ने का मतलब है कि बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेना महंगा हो जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप बैंक अपने ग्राहकों के लिए भी कर्ज की ब्याज दरों में इजाफा करेंगे।
रेपो रेट क्या है और इसका आपकी जेब से क्या संबंध है?
रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी अल्पकालिक जरूरतों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से ऋण लेते हैं।
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जब रेपो रेट बढ़ता है, तो बैंकों की उधारी लागत (Cost of Funds) बढ़ जाती है।
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बैंक इस लागत की भरपाई करने के लिए एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) या MCLR से जुड़े लोन्स की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं।
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इसका सीधा असर यह होता है कि मौजूदा फ्लोटिंग रेट वाले लोन की मासिक किस्त (EMI) या लोन की कुल अवधि (Tenure) बढ़ जाती है।
आपकी EMI पर कितना असर पड़ेगा? (गणितीय उदाहरण)
यदि किसी बैंक ने रेपो रेट में वृद्धि के बाद लोन की ब्याज दरों में 0.25% (25 बेसिस पॉइंट्स) या 0.50% (50 बेसिस पॉइंट्स) की बढ़ोतरी की, तो 20 वर्ष की अवधि वाले होम लोन की मासिक किस्त पर पड़ने वाला अनुमानित प्रभाव इस प्रकार होगा:
(नोट: गणनाएं फ्लोटिंग रेट होम लोन के फार्मूले पर आधारित हैं। वास्तविक आंकड़े बैंक की विशिष्ट शर्तों के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं।)
लोन ग्राहकों के पास क्या विकल्प हैं?
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EMI बढ़ाएं या लोन की अवधि (Tenure): ब्याज दर बढ़ने पर बैंक अक्सर डिफ़ॉल्ट रूप से लोन की अवधि बढ़ा देते हैं ताकि मासिक किस्त समान रहे। हालांकि, अवधि बढ़ाने से कुल ब्याज काफी अधिक चुकाना पड़ता है। यदि बजट अनुमति दे, तो लोन की अवधि बढ़ाने के बजाय मासिक EMI बढ़वाना बेहतर विकल्प होता है।
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पार्ट-पेमेंट (Part-Payment) करें: यदि आपके पास कोई अतिरिक्त बचत या बोनस उपलब्ध है, तो मूलधन (Principal Amount) का एक हिस्सा समय-समय पर चुकाएं। इससे लोन का कुल मूलधन कम होगा और ब्याज का दबाव घटेगा।
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बैलेंस ट्रांसफर पर विचार करें: अपने मौजूदा बैंक की ब्याज दर की तुलना अन्य बैंकों या हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों से करें। यदि कोई अन्य बैंक काफी कम ब्याज दर की पेशकश कर रहा है, तो लोन ट्रांसफर करने के विकल्प की जांच करें (प्रोसेसिंग फीस और ट्रांसफर शुल्क का आकलन अवश्य करें)।
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फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) धारकों को लाभ: रेपो रेट बढ़ने का एक सकारात्मक पहलू यह है कि बैंक अपनी सावधि जमा (FD) और बचत योजनाओं पर भी ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं, जिससे वरिष्ठ नागरिकों और बचतकर्ताओं को बेहतर रिटर्न मिलेगा।
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