WHO Warning: 2050 तक हर 4 में से 1 व्यक्ति को होगी सुनने की समस्या !

WHO की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक दुनिया का हर चौथा व्यक्ति सुनने की समस्या से जूझ रहा होगा। यानी 2.5 अरब लोग! यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, एक चेतावनी है।

WHO Warning: 2050 तक हर 4 में से 1 व्यक्ति को होगी सुनने की समस्या !

यह रहा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्ट पर आधारित एक विस्तृत और जानकारीपूर्ण आर्टिकल, जिसे आप अपनी वेबसाइट के लिए उपयोग कर सकते हैं:


2050 तक हर 4 में से 1 व्यक्ति को होगी सुनने की समस्या: WHO की रिपोर्ट ने दी बड़ी चेतावनी

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और गैजेट्स के बढ़ते इस्तेमाल ने हमें एक ऐसी अनजानी मुसीबत की ओर धकेल दिया है, जिसका अंदाजा शायद ही किसी को हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 'वर्ल्ड रिपोर्ट ऑन हियरिंग' के अनुसार, साल 2050 तक दुनिया का हर चौथा व्यक्ति कान की समस्याओं या बहरेपन का शिकार हो सकता है।

यह आंकड़ा डराने वाला है, क्योंकि इसका सीधा असर लगभग 2.5 अरब लोगों पर पड़ेगा। अगर समय रहते सावधानी नहीं बरती गई, तो इनमें से कम से कम 70 करोड़ लोगों को गंभीर इलाज और पुनर्वास (Rehabilitation) की जरूरत होगी।

क्या कहती है WHO की रिपोर्ट? (Key Highlights)

WHO की पहली वैश्विक श्रवण रिपोर्ट (World Report on Hearing) के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • तेजी से बढ़ता खतरा: वर्तमान में करीब 43 करोड़ लोग सुनने की समस्या से जूझ रहे हैं, जो 2050 तक बढ़कर 250 करोड़ (2.5 Billion) हो सकते हैं।

  • युवाओं पर जोखिम: दुनिया भर के 1.1 अरब युवा (12-35 वर्ष) हेडफोन और ईयरबड्स के गलत इस्तेमाल और शोर-शराबे वाली जगहों (जैसे क्लब या कॉन्सर्ट) के कारण बहरेपन के खतरे में हैं।

  • इलाज की कमी: रिपोर्ट बताती है कि गरीब और मध्यम आय वाले देशों में 80% लोग ऐसे हैं जिन्हें इलाज नहीं मिल पा रहा है। कई देशों में प्रति 10 लाख लोगों पर एक भी कान का डॉक्टर (ENT Specialist) नहीं है।

सुनने की शक्ति कम होने के मुख्य कारण

  1. तेज आवाज में संगीत (Loud Music): लंबे समय तक ईयरफोन या हेडफोन पर ऊंची आवाज में गाने सुनना सबसे बड़ा कारण बन रहा है।

  2. बढ़ता शोर प्रदूषण: कारखानों, ट्रैफिक और कंस्ट्रक्शन साइट्स का शोर कानों की नसों को स्थायी नुकसान पहुंचा रहा है।

  3. बचपन की बीमारियां: बच्चों में 60% बहरापन संक्रमण (जैसे खसरा या दिमागी बुखार) और जन्म के समय होने वाली जटिलताओं की वजह से होता है, जिसे रोका जा सकता है।

  4. दवाओं का दुष्प्रभाव: कुछ खास एंटीबायोटिक्स और दवाएं भी सुनने की क्षमता को नुकसान पहुँचा सकती हैं।

  5. उम्र का बढ़ना: उम्र के साथ कानों की कोशिकाएं कमजोर होने लगती हैं, जिसे 'प्रेस्बीक्यूसिस' कहा जाता है।

बचाव के तरीके: अपने कानों को कैसे सुरक्षित रखें?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हम अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव करें, तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है:

  • 60/60 का नियम: हेडफोन का इस्तेमाल करते समय वॉल्यूम 60% से कम रखें और हर 60 मिनट बाद कानों को आराम दें।

  • ईयरप्लग का उपयोग: शोर-शराबे वाली जगहों पर काम करते समय ईयरप्लग या नॉयस-कैंसलिंग हेडफोन का प्रयोग करें।

  • कानों की सफाई: कान में तीली, सेफ्टी पिन या कोई भी नुकीली चीज न डालें। ईयरवैक्स साफ करने के लिए डॉक्टर की सलाह लें।

  • नियमित जांच: अगर आपको सुनने में दिक्कत हो या कान में लगातार 'सीटी' बजने (Tinnitus) की आवाज आए, तो तुरंत ईएनटी (ENT) डॉक्टर से मिलें।

  • टीकाकरण: बच्चों को खसरा, रूबेला और मैनिंजाइटिस जैसे टीकों के साथ समय पर प्रतिरक्षित करें।

WHO की यह रिपोर्ट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है। सुनने की क्षमता का खोना केवल शारीरिक समस्या नहीं है, बल्कि यह इंसान को मानसिक और सामाजिक रूप से भी अकेला कर देता है। अपनी सुनने की शक्ति को हल्के में न लें—आज की सावधानी कल की खामोशी से बचा सकती है।