15-17 साल और गुजरात में 6 बड़े लट्ठाकांड...
कागजों में सख्त शराबबंदी, जमीन पर मौत की मंडी! भावनगर से लेकर अहमदाबाद तक, लट्ठाकांड का यह खूनी खेल आखिर कब रुकेगा?
गुजरात में शराबबंदी के खोखले दावे: कागजों में नियम, जमीन पर मौत का तांडव
गांधी की जन्मभूमि गुजरात में शराबबंदी केवल सरकारी दस्तावेजों और बयानों तक ही सिमट कर रह गई है। हाल ही में भावनगर में सामने आया जहरीली शराब (लट्ठाकांड) का मामला इस बात का ताजा प्रमाण है कि राज्य में अवैध शराब का नेटवर्क कितना बेखौफ और सक्रिय है। यह कोई पहली घटना नहीं है—बीते 15–17 वर्षों के दौरान राज्य कम से कम 6 बड़े लट्ठाकांड झेल चुका है, जिनमें सैकड़ों निर्दोषों की जान जा चुकी है।
भावनगर का ताजा मामला: प्रशासनिक दावों की खुली पोल
भावनगर जिले में अवैध और रासायनिक तत्वों से बनी नकली शराब पीने से कई लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचे।
पिछले 15-17 वर्षों के प्रमुख लट्ठाकांड
गुजरात में समय-समय पर जहरीली शराब के बड़े मामले सामने आते रहे हैं:
| वर्ष / क्षेत्र | घटना का विवरण | असर व स्थिति |
| 2009 (अहमदाबाद लट्ठाकांड) | कागड़ापीठ और ओधव क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से इतिहास का सबसे भीषण कांड हुआ। | 130 से अधिक लोगों की मौत; इसके बाद कानून में मृत्युदंड का प्रावधान जोड़ा गया। |
| 2016 (सूरत लट्ठाकांड) | वरेली गांव में औद्योगिक रसायनों से तैयार अवैध शराब के कारण हादसा हुआ। | 20 से अधिक लोगों की जान गई, दर्जनों अस्पताल में भर्ती हुए। |
| 2021 (महिसागर व अन्य इलाके) | ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर तैयार 'पोटली' शराब के सेवन से कई मौतें दर्ज हुईं। | प्रशासनिक लापरवाही और स्थानीय मिलीभगत उजागर। |
| 2022 (बोटाद/बरवाला लट्ठाकांड) | अहमदाबाद से चुराई गई मिथाइल अल्कोहल (केमिकल) को पानी में मिलाकर शराब के नाम पर बेचा गया। | 42 से अधिक लोगों की मौत, 100 से अधिक लोग प्रभावित। |
| 2024-2026 (सौराष्ट्र व अन्य क्षेत्र) | भावनगर व आसपास के जिलों में नकली विदेशी व देशी शराब के सेवन से गंभीर घटनाएं सामने आईं। | लगातार हो रही मौतें शराबबंदी नीति के क्रियान्वयन पर सवाल उठाती हैं। |
कागजी कानून बनाम जमीनी हकीकत: असफलता के 4 मुख्य कारण
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औद्योगिक केमिकल पर निगरानी का अभाव:
गुजरात एक प्रमुख औद्योगिक राज्य है जहां मिथाइल अल्कोहल भारी मात्रा में इस्तेमाल होता है।
कंपनियों और गोदामों से इस जानलेवा केमिकल का अवैध बाजार में पहुंचना प्रशासनिक निगरानी की विफलता को दिखाता है। -
अवैध ‘पोटली’ और नकली लेबलिंग का नेटवर्क:
गांवों और कच्ची बस्तियों में ₹30 से ₹50 में मिलने वाली रासायनिक 'पोटली' और नकली ब्रांडेड शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
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स्थानीय स्तर पर सांठगांठ:
स्थानीय सरपंचों और नागरिकों द्वारा पुलिस को अवैध अड्डों की लिखित शिकायत देने के बावजूद समय पर कार्रवाई न होना बूटलेगरों (शराब माफिया) के हौसले बढ़ाता है।
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कड़े कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन:
2009 के बाद गुजरात निषेध कानून में सख्त संशोधन किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर पकड़ और सजा की दर बेहद सीमित रही है।
गुजरात में शराबबंदी को लेकर केवल राजनीतिक बयानबाजी और कागजी नियम मौजूद हैं। जब तक केमिकल की आपूर्ति पर सख्त नियंत्रण, पुलिस-माफिया गठजोड़ पर नकेल और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे लट्ठाकांड निर्दोष लोगों की जान लेते रहेंगे।
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