सुप्रीम कोर्ट का कड़ा प्रहार: अब वकीलों को नहीं मिलेगी बेवजह 'तारीख पर तारीख'

अब बिना किसी ठोस और असाधारण कारण के वकीलों को नई तारीख नहीं मिलेगी, ताकि करोड़ों लंबित मामलों का निपटारा तेजी से हो सके।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा प्रहार: अब वकीलों को नहीं मिलेगी बेवजह 'तारीख पर तारीख'

‘तारीख पर तारीख’ के दौर पर लगेगा ब्रेक: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई टालने के नियमों को किया सख्त

भारतीय न्यायपालिका में "तारीख पर तारीख" का मुहावरा दशकों से न्याय की धीमी रफ्तार का प्रतीक बना हुआ है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अब बिना किसी ठोस कारण के सुनवाई टालना (Adjournment) आसान नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही में तेजी लाने और लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए नए दिशा-निर्देश और सख्त नियम लागू करने के संकेत दिए हैं।


सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: "अदालतें पिकनिक स्पॉट नहीं"

हालिया सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि मामले को बार-बार टालने की अनुमति देना न्याय प्रणाली का अपमान है। कोर्ट ने साफ किया कि:

  • अंतिम समय पर स्थगन (Last-minute Adjournments): वकीलों द्वारा अंतिम समय में मामले को टालने की अर्जी अब आसानी से स्वीकार नहीं की जाएगी।

  • ठोस कारण अनिवार्य: यदि किसी वकील को सुनवाई टालनी है, तो उन्हें इसका बेहद गंभीर और ठोस कारण देना होगा। व्यक्तिगत असुविधा या तैयारी न होना अब आधार नहीं बनेंगे।

  • लगातार तारीखें: कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जो मामले पुराने हैं या जो सुनवाई के अंतिम चरण में हैं, उनमें बार-बार तारीखें देने के बजाय निरंतर सुनवाई की जाए।


क्यों जरूरी था यह फैसला?

  1. करोड़ों मामले लंबित: भारत की विभिन्न अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। स्थगन (Adjournment) इस देरी का एक प्रमुख कारण है।

  2. न्याय की लागत: बार-बार तारीख मिलने से आम आदमी पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। वकील की फीस और कोर्ट के चक्कर काटने में गरीब आदमी पीस जाता है।

  3. सिस्टम पर भरोसा: समय पर न्याय न मिलने से आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कम होता है। 'Justice delayed is justice denied' (देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है) की अवधारणा को खत्म करने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य था।


नए नियमों का संभावित असर

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती के बाद अब वकीलों और वादियों को अपनी तैयारी पुख्ता रखनी होगी। जानकारों का मानना है कि इससे:

  • मामलों का निपटारा 30-40% तेजी से हो सकेगा।

  • न्यायाधीशों के समय की बर्बादी रुकेगी।

  • जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों (Undertrials) को जल्द राहत मिल सकेगी।


सुप्रीम कोर्ट का यह कदम भारतीय कानूनी इतिहास में एक "गेम चेंजर" साबित हो सकता है। यदि निचली अदालतें भी इस सख्ती का पालन करती हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब "तारीख पर तारीख" का शोर थमेगा और लोगों को समय पर न्याय मिलेगा।