धर्म परिवर्तन के साथ ही खत्म हो जाएगा SC/ST का दर्जा, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला !

धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और आरक्षण समाप्त हो जाता है क्योंकि यह केवल हिंदू, सिख और बौद्धों तक सीमित है।

धर्म परिवर्तन के साथ ही खत्म हो जाएगा SC/ST का दर्जा, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला !

धर्म परिवर्तन और SC/ST आरक्षण: क्या कहता है कानून और सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख ?

भारत में आरक्षण और धार्मिक पहचान का गहरा संबंध रहा है। अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या धर्म बदलने के बाद भी किसी व्यक्ति को उसकी मूल जाति के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) का लाभ मिलता रहेगा? सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न टिप्पणियों और संवैधानिक आदेशों ने इस पर एक स्पष्ट रेखा खींची है।

अनुसूचित जाति (SC) और धर्म: 1950 का आदेश

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार, 'अनुसूचित जाति' का दर्जा केवल उन्हीं व्यक्तियों को मिल सकता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं।

कानूनी स्थिति यह है कि यदि कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति से संबंध रखता है, वह ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो वह तत्काल अपना SC दर्जा खो देता है। इसके पीछे तर्क यह है कि SC का दर्जा उन लोगों को दिया गया था जिन्होंने हिंदू समाज में ऐतिहासिक रूप से 'अस्पृश्यता' या छुआछूत का सामना किया। चूंकि ईसाई और इस्लाम धर्म सैद्धांतिक रूप से समानता की बात करते हैं और वहां जाति प्रथा का अस्तित्व नहीं माना जाता, इसलिए धर्मांतरित व्यक्तियों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है।

अनुसूचित जनजाति (ST) की स्थिति अलग क्यों है?

अनुसूचित जनजातियों (ST) के मामले में नियम बिल्कुल अलग हैं। ST का दर्जा धर्म पर आधारित न होकर नृवंशविज्ञान (Ethnography) और संस्कृति पर आधारित है।

अदालतों ने स्पष्ट किया है कि एक आदिवासी व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म को अपना ले, उसकी जनजातीय पहचान और उसके रीति-रिवाज नहीं बदलते। इसलिए, यदि कोई ST व्यक्ति ईसाई या मुस्लिम बनता है, तब भी उसका ST का दर्जा और आरक्षण का लाभ बरकरार रहता है। वर्तमान में 'डी-लिस्टिंग' (धर्मांतरित आदिवासियों को ST सूची से बाहर करना) की मांग को लेकर बहस चल रही है, लेकिन वर्तमान कानून के तहत उनका दर्जा खत्म नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों में यह साफ किया है कि आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक पिछड़ापन दूर करना नहीं, बल्कि उस सामाजिक कलंक को मिटाना है जो सदियों से कुछ जातियों के साथ जुड़ा रहा है।

  • पुनर्वापसी (Ghar Wapsi) का नियम: यदि कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम अपनाने के बाद फिर से हिंदू धर्म में वापस आता है, तो क्या उसे SC दर्जा वापस मिलेगा? इस पर कोर्ट का कहना है कि यदि वह व्यक्ति अपनी मूल जाति में वापस स्वीकार कर लिया जाता है और समाज उसे अपना लेता है, तो उसे पुनः आरक्षण का लाभ मिल सकता है।

  • मौजूदा जांच: वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट एक महत्वपूर्ण याचिका पर विचार कर रहा है, जिसमें मांग की गई है कि 'दलित ईसाइयों' और 'दलित मुस्लिमों' को भी SC का दर्जा दिया जाए। केंद्र सरकार ने इसके लिए के.जी. बालकृष्णन आयोग का गठन किया है, जिसकी रिपोर्ट इस दिशा में भविष्य तय करेगी।

संक्षेप में, वर्तमान कानूनी स्थिति यह है कि धर्म परिवर्तन करने पर केवल अनुसूचित जाति (SC) के व्यक्तियों का आरक्षण अधिकार प्रभावित होता है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) के अधिकारों पर इसका सीधा प्रभाव नहीं पड़ता। यह विषय अब भी कानूनी और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।