हड्डियों की पूजा; देवभूमि का सबसे रहस्यमयी मंदिर !

रुद्रप्रयाग के क्रौंच पर्वत पर स्थित कार्तिक स्वामी मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ भगवान कार्तिकेय की पवित्र अस्थियों की पूजा की जाती है। यह मंदिर त्याग और भक्ति का प्रतीक है, जहाँ भक्त हिमालय की चोटियों के बीच दिव्य शांति का अनुभव करते हैं।

हड्डियों की पूजा; देवभूमि का सबसे रहस्यमयी मंदिर !

उत्तराखंड की हसीन वादियों और ऊंचे पहाड़ों में न जाने कितने रहस्य छिपे हैं। इन्हीं रहस्यों में से एक है कार्तिक स्वामी मंदिर, जिसे 'क्रौंच पर्वत' का ताज माना जाता है। रुद्रप्रयाग जिले में स्थित यह मंदिर न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए, बल्कि अपनी उस अनोखी परंपरा के लिए भी जाना जाता है, जो शायद ही दुनिया के किसी और मंदिर में देखने को मिले।

यहाँ प्रस्तुत है आपकी वेबसाइट के लिए एक विस्तृत और जानकारीपूर्ण आर्टिकल:


देवभूमि का वो मंदिर, जहाँ मूर्ति नहीं बल्कि 'अस्थियों' की होती है पूजा

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में समुद्र तल से लगभग 3,050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है 'कार्तिक स्वामी मंदिर'। यह मंदिर भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय को समर्पित है। लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ भगवान की किसी पत्थर की मूर्ति की पूजा नहीं की जाती, बल्कि माना जाता है कि यहाँ आज भी भगवान कार्तिकेय की अस्थियां मौजूद हैं।

पौराणिक कथा: क्यों त्यागा था भगवान कार्तिकेय ने अपना शरीर?

इस मंदिर से जुड़ी कथा बेहद भावुक और त्याग से भरी है। शिव पुराण के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों (गणेश और कार्तिकेय) के सामने एक शर्त रखी। शर्त यह थी कि जो सबसे पहले ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर आएगा, उसका विवाह पहले होगा (या उसे फल मिलेगा)।

  • कार्तिकेय का प्रयास: कार्तिकेय अपने वाहन मयूर (मोर) पर सवार होकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करने निकल पड़े।

  • गणेश जी की बुद्धि: गणेश जी ने अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) को ही पूरा ब्रह्मांड मानकर उनके सात चक्कर लगा लिए और विजयी घोषित हुए।

जब कार्तिकेय वापस लौटे और उन्हें पता चला कि वे हार चुके हैं, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हो गए। उन्होंने वैराग्य धारण करने का निर्णय लिया। अपनी भक्ति और क्रोध की पराकाष्ठा में उन्होंने अपना मांस माता पार्वती को और अपनी अस्थियां पिता महादेव को समर्पित कर दीं। मान्यता है कि उनकी वे अस्थियां आज भी इस मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक शिला के रूप में सुरक्षित हैं।


मंदिर की विशेषताएं और महत्व

  1. 360-डिग्री हिमालय व्यू: यहाँ से नंदा देवी, त्रिशूल और चौखंबा जैसी गगनचुंबी चोटियों का अद्भुत नजारा दिखता है।

  2. हजारों घंटियों की गूँज: मंदिर के चारों ओर श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई हजारों घंटियां बंधी हैं। जब हवा चलती है, तो इन घंटियों की आवाज पूरे पर्वत पर एक दिव्य संगीत पैदा करती है।

  3. कठिन चढ़ाई: कनकचौरी गांव से मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग 3 किलोमीटर का पैदल ट्रेक करना पड़ता है, जो घने जंगलों के बीच से होकर गुजरता है।


कैसे पहुँचें कार्तिक स्वामी मंदिर?

अगर आप इस दिव्य स्थान के दर्शन करना चाहते हैं, तो आपको रुद्रप्रयाग पहुँचना होगा। वहां से लगभग 38 किलोमीटर की दूरी पर कनकचौरी गांव है, जहाँ से मंदिर का पैदल रास्ता शुरू होता है।

  • निकटतम हवाई अड्डा: जॉली ग्रांट, देहरादून।

  • निकटतम रेलवे स्टेशन: ऋषिकेश / योग नगरी ऋषिकेश।

  • सड़क मार्ग: ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग और फिर कनकचौरी के लिए बस या टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।